म्यूचुअल फंड आम निवेशकों को कम लागत में कई तरह की प्रतिभूतियों (सिक्योरिटीज) में निवेश करने का मौका देते हैं, जबकि निवेश से जुड़े फैसले एक पेशेवर मैनेजर पर छोड़ दिए जाते हैं। इस लेख में बताया गया है कि म्यूचुअल फंड क्या हैं, ये कैसे काम करते हैं, इनके क्या फायदे हैं, इनमें कौन-कौन से खर्च लगते हैं और इनमें क्या जोखिम शामिल हैं। म्यूचुअल फंड क्या हैं? म्यूचुअल फंड एक सामूहिक निवेश माध्यम है, जो कई निवेशकों से पैसा इकट्ठा करता है और उसे इक्विटी, बॉन्ड, सरकारी प्रतिभूतियों और मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करता है। म्यूचुअल फंड स्कीम में जमा किए गए पैसे को पेशेवर फंड मैनेजर, स्कीम के निवेश उद्देश्यों के अनुसार स्टॉक, बॉन्ड आदि में निवेश करते हैं। इस सामूहिक निवेश से होने वाली कमाई या लाभ को, स्कीम के खर्च और शुल्क काटने के बाद, निवेशकों के बीच उनके निवेश के अनुपात में बांट दिया जाता है। इसके लिए स्कीम की "नेट एसेट वैल्यू" (NAV) की गणना की जाती है। इसके बदले में, म्यूचुअल फंड एक छोटी सी फीस लेते हैं। संक्षेप में कहें तो, म्यूचुअल फंड कई निवेशकों द्वारा जमा किए गए पैसों का एक सामूहिक पूल है, जिसे एक पेशेवर फंड मैनेजर द्वारा प्रबंधित किया जाता है। भारत में म्यूचुअल फंड, 'इंडियन ट्रस्ट एक्ट, 1882' के तहत एक ट्रस्ट के रूप में बनाए जाते हैं और ये 'सेबी (म्यूचुअल फंड) रेगुलेशंस, 1996' के नियमों का पालन करते हैं। किसी स्कीम को मैनेज करने के लिए म्यूचुअल फंड जो फीस या खर्च लेते हैं, वे सेबी (SEBI) द्वारा तय की गई सीमाओं के दायरे में होते हैं और विनियमित (रेगुलेटेड) होते हैं। म्यूचुअल फंड कैसे काम करता है? जब आप किसी म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं, तो आप अपना पैसा कई अन्य निवेशकों के पैसों के साथ मिला देते हैं। म्यूचुअल फंड आपके द्वारा निवेश की गई रकम के बदले, उस समय की NAV (नेट एसेट वैल्यू) के हिसाब से आपको "यूनिट" जारी करता है। म्यूचुअल फंड से मिलने वाले रिटर्न में डिविडेंड, ब्याज, कैपिटल गेन या अन्य तरह की कमाई शामिल हो सकती है, जिसे निवेशकों के बीच बांट दिया जाता है। अगर आप अपने म्यूचुअल फंड यूनिट्स को अपनी निवेश की गई रकम से ज़्यादा (या कम) कीमत पर बेचते हैं, तो आपको कैपिटल गेन (या लॉस) हो सकता है। जब भी बाज़ार में बड़ी गिरावट आए या तेज़ी आए, तो बार-बार फंड के परफॉरमेंस को चेक करने के लालच से बचना चाहिए। एक एक्टिवली मैनेज्ड इक्विटी स्कीम के मामले में, आपको धैर्य रखना चाहिए और फंड को पोर्टफोलियो में रिटर्न देने के लिए पर्याप्त समय (लगभग 18 से 24 महीने) देना चाहिए। म्यूचुअल फंड उन निवेशकों के लिए बहुत अच्छे हैं जो: शेयर बाज़ार में सीधे निवेश करने के लिए ज़रूरी जानकारी, कौशल या अनुभव नहीं रखते हैं अपनी संपत्ति बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन उनके पास शेयर बाज़ार पर रिसर्च करने का न तो मन है और न ही समय केवल छोटी रकम निवेश करना चाहते हैं म्यूचुअल फंड में निवेश क्यों करें? निवेश के लक्ष्य हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकते हैं, जैसे रिटायरमेंट के बाद के खर्च, बच्चों की पढ़ाई या शादी के लिए पैसे, या घर खरीदना। इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अलग-अलग तरह के निवेश विकल्पों की ज़रूरत होती है। अलग-अलग सिक्योरिटीज (शेयर या बॉन्ड) में सीधे निवेश करने की तुलना में, म्यूचुअल फंड कई खास फायदे देते हैं। म्यूचुअल फंड में इक्विटी शेयर, कॉर्पोरेट बॉन्ड, सरकारी सिक्योरिटीज और मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स जैसे कई तरह के निवेश विकल्प मिलते हैं। इससे आम निवेशकों (रिटेल इन्वेस्टर्स) के लिए कैपिटल मार्केट की तेज़ी का फायदा उठाना आसान हो जाता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप कम लागत में कई तरह की सिक्योरिटीज में निवेश कर सकते हैं और निवेश से जुड़े फैसले एक प्रोफेशनल मैनेजर पर छोड़ सकते हैं। म्यूचुअल फंड में निवेश करने के फायदे प्रोफेशनल मैनेजमेंट: हो सकता है कि निवेशकों के पास खुद रिसर्च करने और अलग-अलग शेयर या बॉन्ड खरीदने के लिए समय, ज़रूरी जानकारी या संसाधन न हों। म्यूचुअल फंड को फुल-टाइम, प्रोफेशनल मनी मैनेजर संभालते हैं। उनके पास निवेश को एक्टिव रूप से खरीदने, बेचने और मॉनिटर करने के लिए ज़रूरी विशेषज्ञता, अनुभव और संसाधन होते हैं। एक फंड मैनेजर लगातार निवेशों पर नज़र रखता है और स्कीम के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए पोर्टफोलियो को रीबैलेंस (पुनर्संतुलित) करता है। पेशेवर फंड मैनेजरों द्वारा पोर्टफोलियो का प्रबंधन, म्यूचुअल फंड के सबसे महत्वपूर्ण फायदों में से एक है। जोखिम का विविधीकरण (Risk Diversification): म्यूचुअल फंड में यूनिट्स खरीदना, अपने निवेश को कई तरह की प्रतिभूतियों (securities) और एसेट कैटेगरी - जैसे इक्विटी, डेट और सोना - में फैलाने का एक आसान तरीका है। इससे जोखिम बंट जाता है, ताकि आपका सारा निवेश एक ही जगह पर न रहे। यह तब फायदेमंद होता है जब किसी स्कीम में शामिल कोई एसेट खराब बाजार स्थितियों का सामना कर रहा हो: एक एसेट क्लास से जुड़ा जोखिम दूसरे एसेट क्लास द्वारा संतुलित हो जाता है। अगर पोर्टफोलियो में किसी एक निवेश की वैल्यू कम भी हो जाती है, तो हो सकता है कि बाकी निवेशों पर इसका असर न पड़े, या उनकी वैल्यू बढ़ भी जाए। दूसरे शब्दों में, अगर आपके पोर्टफोलियो का कोई एक हिस्सा खराब दौर से गुजरता है, तो भी आपका पूरा निवेश नहीं डूबता। म्यूचुअल फंड में निवेश करने के फायदे (जारी) किफायती और सुविधाजनक (छोटी रकम का निवेश): कई निवेशकों के लिए, किसी एक म्यूचुअल फंड में शामिल सभी अलग-अलग सिक्योरिटीज को सीधे खरीदना काफी महंगा पड़ सकता है। इसके विपरीत, ज्यादातर म्यूचुअल फंड में शुरुआती निवेश की न्यूनतम राशि काफी किफायती होती है। लिक्विडिटी (नकदी में बदलने की सुविधा): आप अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी भी कामकाजी दिन (जब शेयर बाजार और/या बैंक खुले हों) ओपन-एंडेड म्यूचुअल फंड स्कीम की यूनिट्स को आसानी से रिडीम (कैश में बदल) सकते हैं। इस तरह, आपको अपने पैसों तक आसान पहुंच मिल जाती है। रिडेम्पशन के बाद, स्कीम के प्रकार के आधार पर, पैसा 1 दिन से लेकर 3-4 दिनों के भीतर आपके बैंक खाते में आ जाता है। उदाहरण के लिए, लिक्विड फंड और ओवरनाइट फंड के मामले में, रिडेम्पशन की रकम अगले कामकाजी दिन ही मिल जाती है। हालांकि, क्लोज-एंडेड म्यूचुअल फंड स्कीम की यूनिट्स को केवल मैच्योरिटी (अवधि पूरी होने) पर ही रिडीम किया जा सकता है। इसी तरह, ELSS की यूनिट्स में 3 साल का लॉक-इन पीरियड होता है और इन्हें उसके बाद ही कैश में बदला जा सकता है। कम लागत: बड़े पैमाने पर काम करने के कारण, म्यूचुअल फंड स्कीम का 'एक्सपेंस रेशियो' (खर्च अनुपात) कम होता है। एक्सपेंस रेशियो किसी स्कीम के सालाना संचालन खर्च को दर्शाता है, जिसे फंड की दैनिक नेट एसेट्स (शुद्ध संपत्ति) के प्रतिशत के रूप में बताया जाता है। स्कीम के संचालन खर्च में प्रशासन, प्रबंधन और विज्ञापन से जुड़े खर्च शामिल होते हैं। विभिन्न प्रकार की योजनाओं के लिए एक्सपेंस रेशियो (expense ratio) की सीमाएं, SEBI म्यूचुअल फंड रेगुलेशंस, 1996 के रेगुलेशन 52 के तहत तय की गई हैं। अच्छी तरह से विनियमित (Well-Regulated): म्यूचुअल फंड को कैपिटल मार्केट रेगुलेटर, 'सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया' (SEBI) द्वारा, SEBI (म्यूचुअल फंड) रेगुलेशंस, 1996 के तहत विनियमित किया जाता है। SEBI ने कड़े नियम और कानून बनाए हैं, जो निवेशकों की सुरक्षा, पारदर्शिता, जोखिम कम करने के उचित ढांचे और निष्पक्ष मूल्यांकन (fair valuation) के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हैं। टैक्स लाभ: इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 80C के तहत, ELSS में ₹1,50,000 तक के निवेश पर टैक्स लाभ मिलता है। म्यूचुअल फंड में लंबी अवधि के लिए निवेश करने पर टैक्स के लिहाज से फायदा होता है। एक्सपेंस रेशियो (Expense Ratio) SEBI (म्यूचुअल फंड) रेगुलेशंस, 1996 के तहत, म्यूचुअल फंड को किसी योजना के प्रबंधन (management) के लिए कुछ परिचालन खर्च (operating expenses) वसूलने की अनुमति है। इनमें बिक्री और मार्केटिंग/विज्ञापन खर्च, प्रशासनिक खर्च, ट्रांजैक्शन कॉस्ट, इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट फीस, रजिस्ट्रार फीस, कस्टोडियन फीस और ऑडिट फीस शामिल हैं। ये खर्च फंड की दैनिक नेट एसेट्स (net assets) के प्रतिशत के रूप में वसूले जाते हैं। म्यूचुअल फंड योजना को चलाने और प्रबंधित करने से जुड़े इन सभी खर्चों को सामूहिक रूप से "टोटल एक्सपेंस रेशियो" (TER) कहा जाता है। TER की गणना योजना की औसत नेट एसेट वैल्यू (NAV) के प्रतिशत के रूप में की जाती है। म्यूचुअल फंड की दैनिक NAV, इन खर्चों को घटाने के बाद जारी की जाती है। वर्तमान में भारत में, एक्सपेंस रेशियो 'फंजिबल' (fungible) है; यानी, जब तक कुल एक्सपेंस रेशियो तय सीमा के भीतर है, तब तक किसी विशेष प्रकार के खर्च पर कोई अलग से सीमा नहीं होती है। म्यूचुअल फंड AMC द्वारा फंड से वसूले जा सकने वाले TER की रेगुलेटरी सीमाएं, SEBI म्यूचुअल फंड रेगुलेशंस के रेगुलेशन 52 के तहत तय की गई हैं। 1 अप्रैल, 2020 से, TER की सीमा में बदलाव किया गया है, जो इस प्रकार है: एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) दैनिक नेट एसेट्स के प्रतिशत के रूप में अधिकतम TER इक्विटी फंड के लिए TER डेट फंड के लिए TER पहले 500 करोड़ रुपये पर 2.25% 2.00% अगले 250 करोड़ रुपये पर 2.00% 1.75% अगले 1,250 करोड़ रुपये पर 1.75% 1.50% अगले 3,000 करोड़ रुपये पर 1.60% 1.35% अगले 5,000 करोड़ रुपये पर 1.50% 1.25% अगले 40,000 करोड़ रुपये पर दैनिक नेट एसेट्स में हर 5,000 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी (या उसके किसी हिस्से) पर टोटल एक्सपेंस रेशियो में 0.05% की कमी होगी दैनिक नेट एसेट्स में हर 5,000 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी (या उसके किसी हिस्से) पर टोटल एक्सपेंस रेशियो में 0.05% की कमी होगी 5,000 करोड़ रुपये की दैनिक नेट एसेट (शुद्ध संपत्ति) या उसका कोई हिस्सा 50,000 करोड़ रुपये से अधिक 1.05% 0.80% इसके अलावा, म्यूचुअल फंड को 30 bps (बेसिस पॉइंट्स) तक अतिरिक्त शुल्क लेने की अनुमति दी गई है, यदि टॉप 30 शहरों के बाहर (B30) के रिटेल निवेशकों से आने वाला नया निवेश, (a) स्कीम में आने वाले कुल नए निवेश का कम से कम 30% हो, या (b) स्कीम के तहत प्रबंधित औसत संपत्ति (साल की शुरुआत से अब तक) का 15% हो—इन दोनों में से जो भी अधिक हो। इसका मुख्य उद्देश्य टियर-2 और टियर-3 शहरों के निवेशकों से म्यूचुअल फंड में निवेश को प्रोत्साहित करना है। TER का किसी स्कीम की NAV पर सीधा असर पड़ता है: किसी स्कीम का एक्सपेंस रेशियो जितना कम होगा, उसकी NAV उतनी ही अधिक होगी। इसलिए, म्यूचुअल फंड स्कीम चुनते समय TER एक महत्वपूर्ण पैमाना है। SEBI के मौजूदा नियमों के अनुसार, म्यूचुअल फंड कंपनियों को अपनी वेबसाइट और AMFI की वेबसाइट पर, सभी स्कीमों के TER की जानकारी रोज़ाना देनी होती है। म्यूचुअल फंड में रिस्क स्टैंडर्ड रिस्क फैक्टर म्यूचुअल फंड स्कीम गारंटीड या एश्योर्ड रिटर्न प्रोडक्ट नहीं हैं। म्यूचुअल फंड यूनिट्स में इन्वेस्टमेंट में ट्रेडिंग वॉल्यूम, सेटलमेंट रिस्क, लिक्विडिटी रिस्क और डिफ़ॉल्ट रिस्क जैसे इन्वेस्टमेंट रिस्क शामिल हैं, जिसमें प्रिंसिपल का संभावित नुकसान भी शामिल है। जैसे-जैसे स्कीम जिन सिक्योरिटीज़ में इन्वेस्ट करती है, उनकी कीमत / वैल्यू / इंटरेस्ट रेट में उतार-चढ़ाव होता है, म्यूचुअल फंड स्कीम में इन्वेस्टमेंट की वैल्यू ऊपर या नीचे जा सकती है। स्कीम में अलग-अलग इन्वेस्टमेंट की वैल्यू पर असर डालने वाले फैक्टर्स के अलावा, स्कीम का NAV बड़े इक्विटी और बॉन्ड मार्केट में होने वाले बदलावों के साथ ऊपर-नीचे हो सकता है। यह आम तौर पर कैपिटल और मनी मार्केट पर असर डालने वाले फैक्टर्स से भी प्रभावित हो सकता है, जैसे, लेकिन सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं, इंटरेस्ट रेट्स में बदलाव, करेंसी एक्सचेंज रेट्स, सरकारी पॉलिसीज़ में बदलाव, टैक्सेशन, पॉलिटिकल, इकोनॉमिक या दूसरे डेवलपमेंट्स, और स्टॉक और बॉन्ड मार्केट्स में बढ़ी हुई वोलैटिलिटी। पिछला परफॉर्मेंस किसी भी म्यूचुअल फंड स्कीम के भविष्य के परफॉर्मेंस की गारंटी नहीं देता है। खास रिस्क फैक्टर्स: इक्विटीज़ में इन्वेस्टमेंट से जुड़े रिस्क पैसे खोने का रिस्क: इक्विटी और इक्विटी से जुड़े इंस्ट्रूमेंट्स में इन्वेस्टमेंट में कुछ हद तक रिस्क होता है। इन्वेस्टर्स को इक्विटी स्कीम में तब तक इन्वेस्ट नहीं करना चाहिए जब तक वे प्रिंसिपल के संभावित नुकसान का रिस्क नहीं उठा सकते। प्राइस रिस्क: इक्विटी शेयर और इक्विटी से जुड़े इंस्ट्रूमेंट वोलाटाइल होते हैं और रोज़ाना प्राइस में उतार-चढ़ाव होता रहता है। लिस्टेड सिक्योरिटीज़ के लिए लिक्विडिटी रिस्क: इक्विटी में किए गए इन्वेस्टमेंट की लिक्विडिटी ट्रेडिंग वॉल्यूम और सेटलमेंट पीरियड से सीमित हो सकती है। अचानक आए हालात से सेटलमेंट पीरियड काफी बढ़ सकता है। जबकि स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड सिक्योरिटीज़ में लिक्विडिटी रिस्क कम होता है, इन इन्वेस्टमेंट को बेचने की क्षमता स्टॉक एक्सचेंज पर कुल ट्रेडिंग वॉल्यूम से सीमित होती है। अगर म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो में रखी सिक्योरिटीज़ को बेच नहीं पाता है, तो स्कीम को संभावित नुकसान हो सकता है, अगर स्कीम पोर्टफोलियो में रखी सिक्योरिटीज़ की वैल्यू में बाद में गिरावट आती है। इससे फंड को तब तक नुकसान हो सकता है जब तक सिक्योरिटी पूरी तरह से बिक नहीं जाती। इवेंट रिस्क: कंपनी या सेक्टर-स्पेसिफिक इवेंट के कारण प्राइस रिस्क। स्पेसिफिक रिस्क फैक्टर: डेट सिक्योरिटीज और मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में इन्वेस्टमेंट से जुड़े रिस्क डेट सिक्योरिटीज पर यह रिस्क होता है कि जारी करने वाला ड्यू डेट पर प्रिंसिपल और इंटरेस्ट पेमेंट करने में असमर्थ है (क्रेडिट रिस्क)। वे इंटरेस्ट रेट सेंसिटिविटी, जारी करने वाले की क्रेडिट योग्यता के बारे में मार्केट की सोच और आम मार्केट लिक्विडिटी (मार्केट रिस्क) जैसे फैक्टर्स की वजह से प्राइस वोलैटिलिटी के अधीन भी हो सकते हैं। डेट ऑब्लिगेशन्स में ट्रांज़ैक्शन का समय, जो अक्सर स्कीम में खरीदारी और रिडेम्पशन के समय पर निर्भर करेगा, कैपिटल एप्रिसिएशन या डेप्रिसिएशन का कारण बन सकता है, क्योंकि डेट ऑब्लिगेशन्स की वैल्यू आम तौर पर मौजूदा इंटरेस्ट रेट्स के उलट बदलती है। इंटरेस्ट रेट रिस्क: फिक्स्ड इनकम सिक्योरिटीज़ की मार्केट वैल्यू आम तौर पर इंटरेस्ट रेट मूवमेंट के उलटी होती है। आम तौर पर, जब इंटरेस्ट रेट्स बढ़ते हैं, तो मौजूदा फिक्स्ड इनकम सिक्योरिटीज़ की कीमतें गिरती हैं, और जब इंटरेस्ट रेट्स गिरते हैं, तो ऐसी कीमतें बढ़ जाती हैं। इसलिए, अगर मार्केट इंटरेस्ट रेट्स बढ़ते हैं तो स्कीम पोर्टफोलियो की वैल्यू गिर सकती है और जब मार्केट इंटरेस्ट रेट्स कम होते हैं तो बढ़ सकती है। कीमतों में गिरावट या बढ़ोतरी सिक्योरिटी के कूपन और मैच्योरिटी पर निर्भर करती है। यह उस यील्ड लेवल पर भी निर्भर करता है जिस पर सिक्योरिटी ट्रेड हो रही है। क्रेडिट रिस्क: यह फिक्स्ड इनकम सिक्योरिटीज़ जारी करने वालों द्वारा ब्याज और/या मूल रकम पर डिफ़ॉल्ट से जुड़ा रिस्क है। डिफ़ॉल्ट होने पर, स्कीम को पूरी बकाया रकम नहीं मिल सकती है, और स्कीम का NAV डिफ़ॉल्ट की हद तक गिर सकता है। डिफ़ॉल्ट न होने पर भी, जारी करने वाले की क्रेडिट रेटिंग में उम्मीद के मुताबिक बदलाव के साथ सिक्योरिटी की कीमत बदल सकती है। सरकारी सिक्योरिटी एक सॉवरेन सिक्योरिटी होती है और ज़्यादा सुरक्षित होती है। कॉर्पोरेट बॉन्ड में सरकारी सिक्योरिटीज़ की तुलना में ज़्यादा क्रेडिट रिस्क होता है। कॉर्पोरेट बॉन्ड में भी सुरक्षा के अलग-अलग लेवल होते हैं, और रेटिंग एजेंसी द्वारा ज़्यादा रेटिंग वाला बॉन्ड, उसी रेटिंग एजेंसी द्वारा कम रेटिंग वाले बॉन्ड की तुलना में ज़्यादा सुरक्षित होता है। स्प्रेड रिस्क: कॉर्पोरेट बॉन्ड पर क्रेडिट स्प्रेड अलग-अलग मार्केट कंडीशन के साथ बदल सकते हैं। अगर क्रेडिट स्प्रेड बढ़ता है, तो पोर्टफोलियो में डेट सिक्योरिटीज़ की मार्केट वैल्यू कम हो सकती है, और इसका उल्टा भी हो सकता है। इसी तरह, फ्लोटिंग रेट सिक्योरिटीज़ के मामले में, अगर बेंचमार्क सिक्योरिटी/इंडेक्स पर स्प्रेड बढ़ता है, तो ऐसी सिक्योरिटीज़ की वैल्यू बढ़ जाती है। प्रतिभूतियों (securities) का मूल्य कम हो सकता है। लिक्विडिटी रिस्क (तरलता जोखिम): लिक्विडिटी रिस्क का मतलब है कि किसी प्रतिभूति को उसके 'यील्ड-टू-मैच्योरिटी' (YTM) या वास्तविक मूल्य के आसपास कितनी आसानी से बेचा जा सकता है। बाजार में लिक्विडिटी की स्थिति समय-समय पर बदलती रहती है। बाजार की स्थितियों के आधार पर किसी बॉन्ड की लिक्विडिटी बदल सकती है, जिससे बॉन्ड की कीमत में शामिल 'लिक्विडिटी प्रीमियम' भी बदल सकता है। जब बाजार में लिक्विडिटी कम (tight) होती है, तो प्रतिभूतियों को बेचने पर सामान्य से अधिक 'इम्पैक्ट कॉस्ट' (बेचते समय होने वाला अतिरिक्त नुकसान) लग सकती है। इसके अलावा, बाजार की स्थितियों के कारण पोर्टफोलियो में मौजूद किसी विशेष प्रतिभूति की लिक्विडिटी कम हो सकती है, जिसके चलते उसे बेचते समय अधिक डिस्काउंट देना पड़ सकता है।लिक्विडिटी रिस्क को मापने का मुख्य तरीका डीलर द्वारा बताई गई 'बिड प्राइस' (खरीद मूल्य) और 'ऑफर प्राइस' (बिक्री मूल्य) के बीच का अंतर (spread) है। ट्रेडिंग वॉल्यूम, सेटलमेंट की अवधि और ट्रांसफर की प्रक्रियाएं कुछ निवेशों की लिक्विडिटी को सीमित कर सकती हैं। भारतीय वित्तीय बाजारों के अलग-अलग हिस्सों में सेटलमेंट की अवधि अलग-अलग होती है, और अप्रत्याशित परिस्थितियों में यह अवधि काफी लंबी भी हो सकती है। इसके अलावा, सेटलमेंट में देरी होने पर कुछ समय के लिए स्कीम की संपत्तियों का एक हिस्सा बिना निवेश के रह सकता है, जिस पर कोई रिटर्न नहीं मिलता। साथ ही, हो सकता है कि स्कीम निवेश के अच्छे अवसर भी चूक जाए।प्रतिभूति को बेचते समय हो सकता है कि वह 'इललिक्विड' (जिसे आसानी से न बेचा जा सके) हो जाए, जिससे पोर्टफोलियो के मूल्य में कमी आ सकती है। ऐसी प्रतिबंधित या इललिक्विड प्रतिभूतियों की खरीद कीमत और बाद के मूल्यांकन में काफी बड़ा डिस्काउंट हो सकता है, जो कि उन समान प्रतिभूतियों की बाजार कीमत से कम हो सकता है जिनके लिए एक सक्रिय (liquid) बाजार मौजूद है। काउंटरपार्टी रिस्क: यह वह जोखिम है जिसमें लेनदेन करने वाली दूसरी पार्टी (counterparty) अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में विफल हो सकती है। जैसे कि, भुगतान मिलने के बाद प्रतिभूतियां न देना, या प्रतिभूतियां मिलने के बाद पूरा या आंशिक भुगतान न करना, या तय शर्तों के अनुसार काम न करना। अगर काउंटरपार्टी डिफॉल्ट करती है (वादा पूरा नहीं करती), तो फंड को नुकसान हो सकता है। प्रीपेमेंट रिस्क: यह जोखिम तब पैदा होता है जब उधार लेने वाला व्यक्ति या संस्था तय तारीख से पहले ही लोन चुका देती है। इसके कारण म्यूचुअल फंड स्कीम के 'यील्ड' (रिटर्न) और 'टेन्योर' (अवधि) में बदलाव आ सकता है। जब ब्याज दरें गिरती हैं, तो कर्ज लेने वाले लोग कम ब्याज दर पर उधार लेकर अपने अधिक ब्याज वाले लोन चुका देते हैं। इससे एसेट-बैक्ड सिक्योरिटीज (ABS) की औसत मैच्योरिटी अवधि कम हो जाती है। हालाँकि, ब्याज दरें बढ़ने पर भी 'प्रीपेमेंट रिस्क' (समय से पहले भुगतान का जोखिम) हो सकता है; उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति घर बेचकर अपना मॉर्गेज (होम लोन) चुका देता है, या कार बेचकर अपना ऑटो लोन चुका देता है। चूँकि ब्याज दरें गिरने पर प्रीपेमेंट रिस्क बढ़ जाता है, इसलिए इसके साथ 'री-इन्वेस्टमेंट रिस्क' (पुनर्निवेश जोखिम) भी पैदा हो जाता है। इसका मतलब यह है कि मूल राशि (प्रिंसिपल) को शायद केवल कम ब्याज दर पर ही दोबारा निवेश किया जा सके। री-इन्वेस्टमेंट रिस्क (पुनर्निवेश जोखिम): फिक्स्ड इनकम सिक्योरिटीज में निवेश करने पर री-इन्वेस्टमेंट रिस्क होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कूपन भुगतान या मैच्योरिटी की तारीखों पर चल रही ब्याज दरें, बॉन्ड के मूल कूपन (यानी सिक्योरिटी की खरीद के समय मिलने वाली यील्ड) से अलग हो सकती हैं। इसका नतीजा यह हो सकता है कि निवेश के समय जितनी यील्ड की उम्मीद थी, असल में उससे कम यील्ड मिले। दोबारा निवेश करने से होने वाली अतिरिक्त आय को "ब्याज पर ब्याज" (interest on interest) माना जाता है। यहाँ यह जोखिम हो सकता है कि बीच-बीच में मिलने वाली नकदी (interim cash flows) को जिस दर पर दोबारा निवेश किया जाए, वह मूल रूप से सोची गई दर से कम हो।